Aruna shanbaug story
अरुणा शानबाग
(1948-2015) एक भारतीय नर्स थीं, जिन्होंने मुंबई के केईएम अस्पताल में, जहां वे काम करती थीं, 1973 में हुए एक क्रूर यौन हमले के बाद 42 साल तक कोमा जैसी अवस्था में बिताए। एक सफाईकर्मी द्वारा कुत्ते की चेन से गला घोंटने के कारण उन्हें गंभीर मस्तिष्क क्षति हुई थी। उनके मामले ने 2011 में सर्वोच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले को जन्म दिया, जिसने भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दी।
अरुणा शानबाग मामले के प्रमुख पहलू:
घटना (1973): 27 नवंबर, 1973 को, अरुणा, जो उस समय एक जूनियर नर्स थीं, पर सफाईकर्मी सोहनलाल भरथा वाल्मीकि ने हमला किया, जिसने चेन से उनका गला घोंट दिया, जिससे उनके मस्तिष्क तक ऑक्सीजन की आपूर्ति बंद हो गई।
कोमा जैसी स्थिति: हमले के कारण वह अंधी, लकवाग्रस्त और स्थायी रूप से कोमा जैसी स्थिति में चली गई। केईएम अस्पताल की नर्सों ने 42 वर्षों तक उसकी देखभाल की।
इच्छामृत्यु याचिका (2009-2011):पत्रकार पिंकी विरानी ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए याचिका दायर की , जिसमें गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार के लिए तर्क दिया गया।
कानूनी मील का पत्थर: 7 मार्च, 2011 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उसकी जीवन समाप्ति की याचिका को खारिज कर दिया, लेकिन भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देने वाले व्यापक दिशानिर्देश जारी किए।
मृत्यु: अरुणा शानबाग का निधन 18 मई, 2015 को निमोनिया के कारण हुआ, उन्होंने अस्पताल में चार दशकों से अधिक समय बिताया था।
- Mar 14, 2026
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